महाराष्ट्र-हरियाणा चुनाव परिणामों तथा रुझानों की बकैतीपूर्ण समीक्षा
मित्रों और सहेलियों, आज जब एक के बाद एक चुनाव के नतीजे आ रहे हैं और उनकी समीक्षा के रूप में सारे पार्टीयों के प्रवक्ता तथा बुद्धिजीवी समाचार चैनलों पर बाल की खाल उतारने में भिड़े हुए हैं तो हम कैसे पीछे रह सकते हैं? बकैती यदि एक कला है तो हम इस कला के पुजारी हैं...हम पक्के बकैत हैं!
हरयाणा का तो हिसाब हरयाणवी जनता की तरह ही एकदम सीधा होने जा रहा है। जिस प्रकार किसी हरयाणवी ताऊ से जब कोई पंगा ले तो ताऊ अपना भीमसेनी लट्ठ बिना तेल लगाये उस साहसी व्यक्ति के स्थानविशेष में पेलने में तनिक विलम्ब नहीं करते, ठीक उसी प्रकार हरयाणवी जनता ने भी अपने लट्ठ को सही जगह पेल दिया है, मने वोट से बाकी सारी पार्टियों को सही पाठ पढ़ा दिया है कि अब बस हुई अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति और बस हुआ जातिवाद...अब केवल विकास और न्याय की बात पर वोट देंगे, वर्ना पेल देंगे। देश के अन्य राज्य हरयाणा के जनादेश से इस बात की सीख ले सकते हैं।
अब आते हैं महाराष्ट्र की ओर। यहाँ तो भाई सच पूछो तो किसी फूटबोल मैच वाली उत्तेजना थी। चुनावपूर्व यहाँ के दोनों मुख्य गठबंधन टूट गए - एक बार में दो दो विवाह-विच्छेदन अर्थात तलाक, तलाक, तलाक! माने, युद्ध दो नहीं चार मोर्चों पर लड़ा गया! घटनाक्रम तब अधिक रोचक हो गया जब एक ओर तो मोदी जी ने ठाकरे परिवार एवं शिव सेना पर कोई भी नकारात्मक टिप्पणी ना करने का प्रण ले लिया, वहीँ दूसरी ओर उद्धव जी तथा उनके वीरों ने किसी खार खायी प्रेमिका की तरह विष उगला। अफजल खान से ले कर क्या क्या नहीं कह डाला! कभी प्रेम शुक्ला जी ने मोदी की कब्र खोदने की बात कही तो कभी सम्पादकीय में उनके दिवंगत पिताजी को विवाद में घसीट लिया। इस सारी खींच-तान में उद्धव जी उस छोटे भाई सम प्रतीत होने लगे जो बंटवारे के समय अधिक संपत्ति पर दावा ठोंक बैठता है और ना करने पर बड़े भाई को खरी-खोटी सुना बैठता है। मज़े की बात ये रही कि भाजपा-शिवसेना के इस विवाद के चक्कर में एनसीपी तथा कांग्रेस इस चुनाव में अप्रासंगिक(irrelevant) से हो कर रह गए तथा इस बात की पुष्टि इस समय चुनाव नतीजे तथा रुझान कर रहे हैं। बाकी बचे कुछ 'बडबोले', तो उनपर टिप्पणी ना ही की जाए तो श्रेयस्कर है।
वैसे देखा जाए तो चुनाव प्रचार के समय शिवसेना ने मोदी तथा भाजपा पर टीके किये, मोदी जी ने एनसीपी पर प्रहार किये और एनसीपी ने आखिर में बिना शर्त भाजपा को समर्थन का प्रस्ताव रखा है। क्या मैं अकेला ऐसा हूँ जिसे यह पूरा समीकरण किसी हिंदी फिल्म के 'त्रिकोणीय-प्रेम-श्रृंखला' अर्थात लव लव-ट्रायंगल की भांति प्रतीत हो रहा है? इस दृष्टिकोण की विवेचना अगले आलेख में होगी।
महाराष्ट्र की विशेषता है कि जहाँ यहाँ टपोरियों की कमी नहीं है वहीं इस धरती पर कला-साहित्य के सबसे बड़े प्रेमी तथा सभ्य जन भी यहीं वास करते हैं। यदि आप 'पुणेकर' सभ्यता के बारे में जानते हैं तो आपको ज्ञात होगा कि रेशम के रुमाल में पुरानी घिसी हुई चप्पल लपेट कर बड़े ही अदब के साथ मारने की कला में इनकी कोई बराबरी नहीं कर सकता! मने, भारत में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व में इस कला में यदि पुणेकरों से अधिक निपुण कोई मिल जाए तो मैं आजीवन दाढ़ी नहीं रखूंगा! यही पुणेकर जनता महाराष्ट्र की सभ्यता के चरम का प्रतीक है...अतएव मुझे यह बताने की आवश्यकता नहीं कि यहाँ ऊँट किस करवट बैठेगा और क्यों बैठेगा। उजड्डता से तो यहाँ गाली भी देना सहन ना किया जाए, फिर बिना बात किसी भद्र पुरुष के दिवंगत पिता पर टिप्पणी करना कैसे स्वीकार कर लेती महाराष्ट्र की जनता?
अब पूर्ण बहुमत ना मिलने के परिदृश्य(scenario) में भाजपा-शिवसेना गठबंधन पुनः हो या भाजपा-एनसीपी या शिवसेना-एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन । इन तीन परिदृश्यों में से बाद के दो तो कतई राजनैतिक आत्महत्या सामान होंगे। ऊपर से पहले विकल्प पर दृष्टिपात करें तो उद्धव जी अब भी मुख्यमंत्री पद का हठ लिए बैठे हैं। मतलब, भले ही चुनाव परिणामों की अग्नि में रस्सी स्वाहा हो गयी, परन्तु बल है कि जाने का नाम नहीं ले रहा!
अब सरकार बनाने की उठापटक में दीपावली तक जो राजनैतिक आतिशबाजी देखने मिलेगी उसका आनंद उठाइये। हो सके तो कांग्रेसियों को इस दीवाली भेंट में तनिक 'बर्नोल' दे आइये। शीघ्र ही आगे की बकैती के साथ आप सब के समक्ष उपस्थित होऊंगा।
आपका सेवक
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