मुंबई में मीट-बैन पर मचे विवाद पर एक तटस्थ आकलन
बचपन से पाठशाला में सिखाया गया, स्वयं को बुद्धिजीवी समझने वाले भी इसपर घंटों भाषण देते रहते हैं कि हमें 'सहिष्णु' बनना चाहिए। पर यही तथाकथित 'बुद्धिजीवी' केवल चार दिनों के मीट-बैन पर भिड़े पड़े हैं। मीट-बैन कोई धार्मिक वाद-विवाद ना हो कर केवल शाकाहारी बनाम मांसाहारी विषय है जिसपर राजनैतिक रोटियाँ सिंक गयीं। मांसाहार-शाकाहार पर मैं तटस्थ हो कर विचार मंथन कर पाता हूँ; इसका श्रेय मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि तथा पालन-पोषण को जाता है। ना मांसाहार थोपा गया, ना शाकाहार, पर अंत में मैंने शाकाहार चुना।
मैं सनातनी परिवार से हूँ, साथ ही उसी सनातनी परंपरा की आत्मा "अद्वैत में - अनेकवाद" को अपने संयुक्त कुटुंब में देखता आया हूँ। पहले के परिवार बड़े हुआ करते थे। मेरे दादा जी पूजा-पाठ में नहीं लगे रहते थे, वे कर्मयोगी थे। दादी, जिन्हें हम सभी 'माँ' कहते थे, भले ही एक संयुक्त आर्यसमाजी परिवार से आई थीं, पर हमारी परदादी जी का अनुसरण करते हुए नित्य नियम से पूजाघर में पूजा-पाठ करती थीं, ऐसा उन्होंने किसी के दबाव में नहीं, स्वेच्छा से करना चुना। नहानी से निकल कर पूजाघर तक पहुँचने तक "हरी ॐ तत्सत्" का जाप करती थीं। दोनों बुआ, दो चाचा और पापा शुद्ध शाकाहारी रहे। बड़े चाचा ने मांसाहार चुना, पर बाकियों को कभी मांसाहार के लिए आग्रह नहीं किया, ना घर में ही कभी मांस पका। सौभाग्य से अधिकतर मित्र भी ऐसे मिले कि यदि वे मांसाहारी हो भी तो जब साथ लंच/डिनर के लिए साथ बैठें तो पहले पूछते थे कि कहीं मुझे कोई परेशानी तो नहीं यदि वे नॉनवेज आर्डर करें। मैंने स्वयं कभी उन्हें मना नहीं किया, पर यदि किसी उपस्थित मित्र को समस्या होती तो कभी उन्होंने अपने 'अधिकारों के हनन' की दुहाई नहीं दी। उनका मैं ह्रदय से आभारी हूँ। यही सहिष्णुता है !
एक ओर जहाँ ऐसे सहिष्णु लोग मिले, वहीँ दूसरी ओर सदा कोई ना कोई ऐसा मिलता ही था जो यह सिद्ध करने भिड़ पड़ता था कि मांसाहारियों में अधिक बल होता है अतएव तुम्हें भी शाकाहार छोड़ देना चाहिए। शारीरिक-श्रेष्ठता पाने के लिए आपको मांस-मछली खाना ही होगा। कॉलेज में शौकिया बॉक्सिंग करने लगा था मैं। मुझे इस विवाद में कभी भारी उठा-पटक करने की आवश्यकता नहीं पड़ी — प्रभुकृपा से कई घनघोर मांसाहारियों के जबड़े रिंग में हिला चुका था, आज भी ३-४ घंटे बिना रुके साइकल चलाता हूँ, ३ घंटे पैदल चल लेता हूँ, घंटे भर जोगिंग कर लेता हूँ। मतलब, भले ही ओलिम्पिक-स्वर्ण-पदक-विजेता नहीं हूँ, परन्तु शारीरिक दुर्बलता का आरोप कोई नहीं लगा सकता। इस परिच्छेद/पैराग्राफ का निचोड़ ये है कि मांसाहार से शारीरिक श्रेष्ठता मिलती है ये कहने वालों पर मुझे हँसी आती है।
जैसा कि मैंने पहले कहा कि कई ऐसे घनिष्ठ मित्र हैं मेरे जो घनघोर मांसाहारी हैं। ऐसे ही एक मित्र ने एक बार बताया था कि किस प्रकार उसे सप्ताह में कुछ दिन मांसाहार करने ना मिले तो वह व्याकुल हो उठता है। एक और मित्र ने मांसाहार छोड़ने का प्रयत्न किया (किसी और के कहने पर नहीं), पर ना छोड़ पाया। दोनों ने ही माना कि उनके लिए मांसाहार व्यसन/नशे जैसा है। मैं ना मदिरा को बुरा मानता हूँ, ना ही धूम्रपान को.… पर व्यसनों से दूर रहने का सदा पक्षधर रहा हूँ। आदत तो चाय की भी अच्छी नहीं। प्रातः चाय के बिन जिनका 'प्रेशर' नहीं बनता उन्हें चाय ना मिलने पर दिनभर जो नर्क भोगना पड़ता है वो केवल वो ही जानते हैं। व्यसन पर नियंत्रण कैसे रखा जाता है जानते हैं? व्यसनकारी वस्तु को कुछ दोनों त्याग कर। यही कारण है कि हमारे पूर्वजों ने हमें उपवास करना सिखाया, क्योंकि भोजन भी एक प्रकार का व्यसन है। मैं पक्का चटोरा-स्वादू जीव हूँ, मैं इस व्यसन को भली-भांति जानता हूँ। इसीलिए सप्ताह में कम से कम एक दिन उपवास रखता हूँ। नवरात्री की ९ दिन केवल फलाहार करता हूँ। हर व्यसन से दूर रहने का यथासंभव प्रयत्न करता हूँ। हमारे पूर्वजों ने इस 'भोग' को पूर्णतया त्यागने को नहीं कहा, पर उसे नियंत्रित रखने का सुझाव दिया। इतना ही नहीं, 'भोग' के आनंद को नियंत्रित रूप में भी किस प्रकार पूर्णतया पाएं इसपर भी ज्ञान दिया। ऐसा नहीं होता तो मानवजाति को 'कामसूत्र' जैसा ग्रन्थ कभी ना मिल पाता। भोग नियंत्रण में तथा परदे में करना सभ्य समाज को सुरक्षित रखने के लिए अनिवार्य है — फिर वह भोजन हो या काम!
लोग डाइट करते हैं, डिटॉक्स करने जाते हैं तब भी मांसाहार त्यागने की अनिवार्यता होती है। मांसाहार से शरीर को जो हानि होती है, उसपर तो मैं यहाँ चर्चा भी नहीं करूँगा क्योंकि उसपर कई लोग ज्ञान बघारते रहते हैं। इस पूरे आलेख में मैं शाकाहार को श्रेष्ठ बताने का कोई प्रयत्न नहीं कर रहा। ना लोगों से मांसाहार छोड़ने को कह रहा हूँ। केवल व्यसन पर नियंत्रण रखने का सुझाव दे रहा हूँ, चाहें तो मानें अथवा नहीं। बात इतनी सी है कि जो लोग मांसाहार को अपना अधिकार तथा अपना चुनाव/choice कह कर मीट-बैन पर उत्तेजित हो रहे हैं, उन्हें विनम्रतापूर्वक बताना चाहूंगा कि यदि किसी को बचपन से मांसाहार कराया गया हो, उसके लिए मांसाहार चुनाव नहीं, अनिवार्यता होती है। मांसाहार आपका अधिकार अवश्य है, पर इसे अपनी चॉइस समझना भ्रम मात्र है। ठीक जैसे किसी धूम्रपान के आदि को नो-स्मोकिंग-ज़ोन देख कर कुढ़न होती है, ठीक वैसे ही ये चार दिन का मीट-बैन कुछ लोगों को चुभ गया। यदि ऐसा नहीं होता तो जैसे निर्व्यसनी व्यक्ति के लिए हफ़्तों बिना धूम्रपान कोई बड़ी बात नहीं, ये चार दिन भी कोई भारी नहीं पड़ते। जिन मांसाहारी मित्रों के लिए यह व्यसन नहीं है, उन्हें कोई आपत्ति नहीं हुई... जब तक इसे 'अधिकारों' का विषय ना बना दिया गया। जी हाँ, बना दिया गया — किसने बनाया? नेताओं ने तो अपनी रोटी सेंक ली, पर विषय को समझना अत्यावश्यक है... सोचिये, विचारिये, समझिए।
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vachanamrat samajhdani se pare hai kaiyeom ke
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