बाबागिरी की दुकान में ठगी का उत्तरदायी कौन?


वैसे तो महान भारतीय प्रेष्या/प्रेस्टीट्यूट्स किसी ईसाई पादरी या मौलवियों के गोरखधंधों पर गूंगे-बहरे हो जाते हैं, पर जब बात भगवाधारी बाबाओं की आती है तो चिंघाड़-चिंघाड़ कर, छाती पीट-पीट कर रुदाली विलाप करते नहीं थकते। हिन्दू समाज को इन महान सेक्युलर-बुद्धिजीवी पत्तर-कारों का आभार मानना चाहिए कि ये ज्ञानीजन हमारे बीच उपस्थित सड़ांध का निपटारा करने में अपना बहुमूल्य योगदान दे रहे हैं। सेक्युलरता की विवशता के कारण यह लाभ दूसरों को नहीं मिल पा रहा, जिसका दूरगामी परिणाम वैसा ही होना है जैसे किसी फोड़े पर बिना उपचार किये पट्टी बांध कर उसे छिपाने की चेष्टा करना होगा। पिछले कुछ समय में कई बाबाओं की पोल खुली। कभी निर्मल बाबा की 'कृपा' की बरसात सूख गयी, तो कभी आसाराम बापू पर निराशा के बादल छा गए। आजकल राधे माँ को 'अपराधे माँ' की उपाधि दिलाने का परिश्रम चालू है। इन सब के बीच मन इस उधेड़-बुन में उजझ जाता है कि क्यों और किस प्रकार इन बाबाओं-माताओं पर लक्ष्मी माता का आशीर्वाद बरसता है, भले भक्त उसी वर्षा की बूँद के लिए तरसते रह जाते हैं?

पूरे पचड़े में 'लोचा' कहाँ है यह भाँपने के लिए अधिक सर-फुटव्वल करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। यदि आप किसी दुकान से कुछ खरीदने जाएँ तथा ऊँचे दाम चुका कर बिन जाँचे-परखे घटिया गुणवत्ता की वस्तु ले आएं, तो दोष किसका? और तो और, यदि यही वास्तु आप स्वयं घर पर उत्तम गुणवत्ता की बना सकें तो बाहर से निकृष्ट गुणवत्ता की चीज़ क्यों खरीदेंगे? — इस 'बाबागिरी की दुकान' से टूटी-फूटी भक्ति तथा थोथे ज्ञान को क्यों सर पर उठाये घूम रहे हैं लोग? — उचित प्रश्न का प्रकट होना ठीक उस प्रकार है जैसे उलझे हुए धागे का एक छोर मिलना - गुत्था सुलझाना अब अधिक सहज हो जायेगा। 

चूंकि हम 'जॅट एज' में जी रहे हैं, हम हर कार्य करने में अधीर रहते हैं। किसी भी कार्य में धैर्य धर उसमें पर्याप्त समय व्यय कर उसका स्वाद ले ही नहीं पाते। चाहे खाना खाना हो, चाहे सम्भोग - हर चीज़ में उतावलापन! इस कारण ना भोजन ही ठीक से पच पाता है और ना सम्भोग में तृप्ति ही मिल पाती है - हर प्रकार के साधन होने पर भी हर बात में मनुष्य अधीर है, अतृप्त है! यही बात अध्यात्म पर भी सार्थक होती है। मन की हर शंका का समाधान, हर कष्ट का निवारण तुरंत चाहिए - जैसे कि मक्डोनल्ड में बर्गर का ऑर्डर दिया और बर्गर उपस्थित! तभी 'अपराधे माँ' जैसों के ड्योढ़ी पर भक्तों का नाचना-गाना चल पाता है। भक्त अपनी समस्याओं के निवारण के लिए निर्मल बाबा की हरी चटनी और लाल चड्डी जैसे टोटके अपनाते हैं और उन्हें दक्षिणा सीधा उनके बैंक अकाउंट में पहुँचा देते हैं, पर किसी पंडित द्वारा दो-चार घंटे की विधिवत पूजा-हवन करवाने में पहले तो आलस आता है और दूजे उस पंडित को दक्षिणा देने में कंजूसी! इससे भी पहले तो किसी विद्वान पंडित को ढूंढने का समय नहीं होता, किसी भी पोंगा-पंडित को बिठा कर 'ॐ-फट-स्वाहा' करवा लेते हैं! इच्छित फलप्राप्ति ना होने पर धर्म पर दोष मढ़ दिया जाता है, पूजा-पाठ को निरर्थक बता दिया जाता है। 

सच पूछा जाये तो हर प्रश्न का उत्तर, हर समस्या का समाधान हमारे समक्ष उपस्थित है, बस ढूंढने की मेहनत करनी है! देसी कहावत है — "पानी पियो छान कर, गुरु करो जान कर"… जो ज्ञान के प्रश्नों के उत्तर चाहते हैं, क्या उन्होंने बाबाओं से पूछने से पहले स्वयं कभी वेदों-पुराणों-गीता में ढूंढने के प्रयत्न किये? यह भी छोड़िये, क्या आज लोगों को साधु, ऋषि, मुनि, गुरु, पंडित आदि शब्दों में भेद पता है? जब भिन्डी, परवल और लौकी में अंतर ना पता हो तो आप बाजार में सब्जी खरीदने में यदि ठग लिए जायें तो त्रुटि किसकी होगी? ताली एक हाथ से नहीं बजती। वर्षा में छतरी लिए बिन जाने पर आप भीगेंगे ही! छतरी ले जाने पर भी यदि वर्षा होने पर उसे ना खोली तब भी भीगेंगे ही। भीगने पर जल अथवा बादलों को भला बुरा कहने वालों को क्या कहना चाहिए, ये कहने की आवश्यकता नहीं है, नहीं?

No comments:

Post a Comment

Popular Posts