विजय पाने के लिए क्या नग्न होना आवश्यक है?
जब वाद-विवाद में प्रतिद्वंदी नंगई पर उतर कर कुतर्क करता है तो क्या करें? अध्यात्म के पास सारे उत्तर हैं, इस समस्या का भी !
मेरा मानना यह है कि … 'दिगंबर' ही पूर्णतया 'अरिहंत' हो सकता है —
यहाँ मैं केवल किसी अवतारी पुरुष अथवा भगवान तक सीमित बात नहीं कर रहा, परन्तु शाब्दिक अर्थ की ओर भी संकेत कर रहा हूँ। भारतीय दर्शन इतना छिछला नहीं कि केवल एक परत में बात कहे। किसी अवतार के हर गुण-दुर्गुण की अनेक व्याख्याएं की जा सकती हैं। आइये मेरी बात का अर्थ समझाऊँ —
'अरिहंत' शब्द की उत्पत्ति अरि(शत्रु) तथा हन्त(नाश) से होती है। इस प्रकार अरिहंत माने वह जो अपने शत्रु का नाश करे। परन्तु अध्यात्म में ये शत्रु बाह्य ना हो कर हमारे भीतर के क्रोध-मान-माया-लोभ-राग-द्वेष हैं।
दिगंबर उन साधुओं को कहा गया जिन्होंने वस्त्रों का त्याग कर नग्न रहने का व्रत ले लिया। इसकी भी गूढ़ व्याख्या होनी चाहिए। वस्त्र केवल शरीर के नहीं होते, मन के भी होते हैं। लज्जा मन का वस्त्र है। जिस प्रकार अनेक वस्त्राभूषणों का प्रयोग शरीर तथा उसकी 'कुरूपताओं-हीनताओं' को छिपा कर शरीर को केवल बाह्य रूप से सुन्दर दिखाने के लिए किया जाता है, उसी प्रकार असत्य तथा छल से मन की कुरूपता को ढँक लिया जाता है। एक ओर जहाँ सामान्यतः सबकुछ त्यागने पर आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त होने का मार्ग प्रशस्त होता है, वहीँ सब त्यागने पर भी कोई एक भाव बंधा रह जाए या बांध लिया जाए तो उस भाव को कितनी शक्ति मिल जाती है वह काली माँ के स्वरुप के माध्यम से समझा जा सकता है। काली माता का मान-मर्यादा-लज्जा त्यागा हुआ क्रोध जहाँ पहले राक्षसों का नाश करता है, वहीँ मर्यादारहित होने के कारण रुक नहीं पाता तथा सृष्टि के अंत का कारक बनने की ओर अग्रसर हो जाता है। परन्तु चूंकि उस क्रोध का कारक प्रेम था, महादेव उसी प्रेम को जागृत कर उस क्रोध को शांत कर पाते हैं।
दिगंबर हो जाने का अर्थ केवल वस्त्र त्याग देना नहीं, अपितु मान-अपमान, लाभ-हानि, सुख-दुःख इत्यादि हर सांसारिक मोह को त्यागना है, 'मैं' त्यागना है। 'दिगंबर' होना आवरण त्यागना है और आवरण अनेक प्रकार के हो सकते हैं। इसी प्रकार शत्रु भी कई प्रकार के होते हैं। सहज बुद्धि यह बताएगी कि शत्रु से युद्ध में कवच के रूप में आवरण का प्रयोग अनिवार्य होता है, फिर आवरण त्यागने पर शत्रु पर विजय कैसे प्राप्त होगी? यहाँ, जिन्हें शस्त्रों का ज्ञान होगा वे जानेंगे कि कवच केवल सुरक्षा बढ़ा देता है पर साथ ही उसके भार से आप स्वयं धीमे पड़ जाते हैं। कवच त्याग यदि आप ने अपनी गति बढ़ा ली तब जब शत्रु के वार आप को छू ही ना पाएंगे तो हानि तो दूर की बात है। नहीं?
पुरानी कहावत है — "नंगे से खुदा हारा"…
वाद-विवाद में जब भी विचारधाराओं का मल्ल्युद्ध होता है तब देखता हूँ कि वामपंथी, लिबरल, फेमिनिस्ट इत्यादि सदा ही हर प्रकार की मान-मर्यादा त्याग कर अपनी बात को सिद्ध करने के लिए ना ना प्रकार के कुतर्क करते हैं.… नंगई की पराकाष्ठा दिख जाती है प्रायः इनमें। वहीँ इनके विरुद्ध डटे हुए परम्परावादी संस्कृति-समाज तथा मान-मर्यादा की रक्षा हेतु उन्हीं मान-मर्यादा-लज्जा के चक्रव्यूह में स्वयं उलझ जाते हैं। उलझ कर या तो हतोत्साहित हो कर चुप हो जाते हैं, या 'फ़्रस्टेटिया' कर गाली-गलौज कर बैठते हैं, और यहीं 'शत्रुओं' की विजय हो जाती है।
दुर्ग की रक्षा करने केवल दुर्ग के भीतर से ही शत्रु पर वार कर सदा विजयश्री नहीं मिलती। कभी कभी उसी दुर्ग के द्वार के बाहर निकल कर शत्रु को धूल चटानी पड़ती हैं। आप अपने दुर्ग को पहले समझिए, उसके अस्तित्व के प्रयोजन तथा सार पर मंथन कीजिये। अपने तर्कों के शस्त्रों को धार चढ़ाइये तथा उन्हें चलाने में पारंगत होइए, तदोपरांत 'दिगंबर' हो जाइये। फिर देखिये, आप ही अरिहंत भी होंगे। तब देखिएगा, कैसे पहले से नंगई कर नाचने वाले किस प्रकार खिसियानी बिल्ली बन कर आपको कोसेंगे-गरियायेंगे !
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