क्यों शरद यादव को अपने कहे पर माफ़ी मांगनी चाहिए?
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अब आपको यह भी बताये देते हैं कि इन महाशय (शरद यादव) जी ने राज्य सभा में क्या गुल खिलाये हैं। उनका कुछ ये कहना था -
"यहाँ तो आदमी गोरी चमड़ी देख कर दंग रह जाता है। मेट्रिमोनियल देखो तो उसमें लिखा हुआ है "गोरी लड़की चाहिए"! अरे आपका भगवान जो है वो साँवला है... राम और कृष्ण दोनों श्याम वर्ण के हैं। और आप गोरे रंग को देख कर कैसे बेहोश होते हो! अभी आई थी (इंडियाज़ डॉटर)फिल्म बनाने … वो उडविन… वो तो जहाँ भी घुसी होगी(इंटरव्यू के लिए अनुमति लेने) वहाँ (उसके गोरे रंग के कारण) दो मिनट में (काम हो गया होगा!)… और हर एक आदमी यहाँ मेट्रिमोनियल देखो तो गोरी गोरी ढूंढ रहा है... अरे तुम्हारा भगवान ही काला था तो साँवला आदमी कोई बुरा होता है क्या? महात्मा गांधी और श्री कृष्ण, ये दोनों बड़े आदमी, दोनों ही साँवले थे। पूरे देश में साँवले आदमी ज्यादा हैं। और साउथ की महिलाएं जितनी खूबसूरत होती है, और जितना उनका बॉडी … पूरा देखने में... याने इतना हमारे यहाँ नहीं होतीं। … वो नृत्य जानती हैं।"हमें विदेशी गोरों की देखासीखी बीमा के क्षेत्र में बाहर वालों को निवेश करने नहीं देना चाहिए। पर हमारे गोरे रंग के प्रति आकर्षण के कारण हम यही करने जा रहे हैं - इस बात को समझाते हुए उन्होंने निम्नलिखित बात कही। परन्तु क्यों? क्या आवश्यकता थी उन्हें लोगों को ये समझाने की कि हम आज भी गोरे तलवे चाटते हैं और कदाचित इसी कारण कोई इटली की मेम हम पर इतने दिनों राज कर पाई। क्या आवश्यकता थी शरद यादव को यह बताने की कि साँवला रंग गोरे रंग से कतई उन्नीस ना है? क्या उन्हें पता नहीं कि यदि वे लोगों को ये बात समझाने में सफल हो जाते तो रंग निखारने वाली क्रीम की कंपनियों की फैक्ट्रियों में ताले लग जाते? क्या उन्हें पता है कि इस से कितने लोगों का रोज़गार छिन जाता? और तो और, क्या आवश्यकता है उन्हें लौंडों की पसंद में दखल देने का? नहीं मतलब, लोकतान्त्रिक देश है... अब लौंडों को गोरी लड़की चाहिए तो वे मेट्रिमोनियल में यही डालेंगे। शरद यादव कौन होते हैं उनहें प्रवचन देने वाले? अब क्या हुआ कि यह एक कटु सत्य है कि साँवले रंग को हम भारतीय आज भी सुंदरता के मानदंडों पर गोरे रंग से पिछड़ा हुआ मानते हैं… पर शरद यादव को कोई अधिकार नहीं कि वे साँवले-सलोने रंग की सुंदरता प्रमाणित करने दक्षिण भारतीय महिलाओं का उदाहरण दें। उन्हें क्या पता नहीं कि वो समय लद चुका जब आप 'पोलिटिकली करेक्ट' भाषा के प्रयोग के बारे में कम और सही सन्देश देने के बारे में अधिक सोचते थे। आज आपको हर शब्द फूँक-फूँक कर कहना चाहिए। क्योंकि फिल्मों में अर्धनग्न शरीर लिए नाच रही बालाओं और नायक-नायिका के बीच 'रेलम-पेल' के दृश्य तो चलते हैं, परन्तु शरद यादव के कहे शब्दों से लोगों को बलात्कार करने की प्रेरणा मिलती है।
हम भीड़ हैं। हमें सबूतों-गवाहों की आवश्यकता नहीं, ना आवश्यकता है किसी कोर्ट कचहरी की। हम दूध के धुले हैं। हम तो केवल अर्नब गोस्वामी के मुख से निकलते तीव्र स्वरों में अटल सत्य पर आँख मूँद कर विश्वास करते हैं। पिछली बार मोहन भागवत जी ने जब 'इण्डिया और भारत' वाली बात कही तब भी हमें इस समाचार की सत्यता की जाँच करने की आवश्यकता नहीं थी। किसी समाचार पत्र ने कह दिया कि मोदी जी का सूट १० लाख का था तो हम इस बात को बढ़ा चढ़ा कर २० लाख तक पहुँचा देंगे। हरयाणा के रोहतक में दो बहनों ने भले ही निर्दोष लौंडों पर हमला किया, पर चूंकि न्यूज़ चैनलों ने कह दिया कि लौंडे गलत थे और लड़कियाँ बहादुर तो बस कह दिया - पत्थर की लकीर! हम केवल आरोप लगाये जाने पर आसाम में किसी को रास्ते पर नंगा कर, घसीट कर मौत के घाट उतारना बेहतर समझते हैं, कोर्ट-कचहरी तो सालों ले लेते हैं किसी को दंड देने में … निर्णय तो चुटकियों में आना चाहिए, फिर चाहे वह गलत ही क्यों ना हो और फिर चाहे उस निर्णय के कारण किसी निर्दोष के प्राण ही क्यों न हर लिए जाएँ। हम भीड़ हैं… हम फैसला ताबडतोब करते हैं। और क्योंकि हम जनता हैं, इसलिए हम सब जानते हैं और हम ही सही हैं। अतएव, जब हम ने कह दिया तो कह दिया - शरद यादव, भले ही आप ने कितनी ही सही बात कही हो, आप को माफ़ी तो मांगनी ही पड़ेगी।
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